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बैंक निजीकरण पर रघुराम राजन का पक्ष - क्या केंद्र सरकार कॉर्पोरेट्स को PSB बेचेगी?

Raghuram Rajan on Bank Privatisation- Will Centre sell PSBs to corporates?

प्रासंगिकता:

जीएस 3 || अर्थव्यवस्था || आर्थिक सुधार || विनिवेश

सुर्खियों में क्यों?

जहां सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक कर्मचारियों का एक वर्ग राज्य द्वारा संचालित ऋणदाताओं के निजीकरण के विरोध में दो दिवसीय हड़ताल पर है, उन्हें RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के रूप में एक दुर्जेय सहयोगी मिल गया है।

वर्तमान प्रसंग:

  • राजन ने, PTI को दिये एक साक्षात्कार में, अक्षम सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के, सफल निजीकरण पर संदेह जताया है, और यह भी कहा है कि अगर उन्हें कॉरपोरेट्स को बेचा जाता है, तो यह एक भारी गलती होगी।
  • उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी उचित आकार वाले बैंक को विदेशी बैंकों को बेचना राजनीतिक रूप से भी संभव नहीं होगा।

निजीकरण और विनिवेश:

भारत में निजीकरण:

  • भारत में निजीकरण अभी भी न्यूनतम स्तर पर है।
  • सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की बिक्री के माध्यम से निजीकरण लगभग नगण्य है, जबकि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के शेयरों के एक हिस्से की बिक्री के माध्यम से विनिवेश भी जारी है।
  • भारत में उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (IDRA), एकाधिकार और प्रतिबंधात्मक व्यापार व्यवहार अधिनियम, 1969 (MRTPA), विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (FERA) और तकनीकी विकास महानिदेशालय (DGTD) द्वारा पूंजीगत मुद्दों पर नियंत्रण और तकनीकी जांच जैसे कानूनों द्वारा सुविधा प्रदान की गई है।
  • स्वतंत्रता के बाद, भारत सरकार ने समाजवादी आर्थिक रणनीतियों को अपनाया। 1980 के दशक में राजीव गांधी ने आर्थिक पुनर्गठन शुरू किया।
  • IMF की मदद से, भारत सरकार ने एक क्रमिक आर्थिक पुनर्गठन शुरू किया।
  • पी.वी. नरसिम्हा राव ने डॉ. मनमोहन सिंह की मदद से क्रांतिकारी आर्थिक विकास का मार्ग प्रशस्त किया।

निजीकरण के लाभ:

  • सूक्ष्म आर्थिक लाभ:
  • आमतौर पर निजी उद्यम, राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों को प्रतिस्पर्धात्मक रूप से मात दे देते हैं। जब तुलना की जाती है, तो निजी उद्यम राजस्व, दक्षता और उत्पादकता के मामले में बेहतर परिणाम दिखाते हैं।
  • निजीकरण प्रतिस्पर्धी क्षेत्रों में गति प्रदान करने वाले मौलिक संरचनात्मक परिवर्तनों को लाता है।
  • निजीकरण, वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक व्यवहार को अपनाने के साथ-साथ प्रबंधन और सतत प्रतिस्पर्धात्मक लाभ और संसाधनों के संवर्धित प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए सर्वोत्तम मानव-प्रतिभा को प्रेरित करने के रूप में परिणत होता है।
  • वृहत् आर्थिक लाभ
  • निजीकरण का उस क्षेत्र के वित्तीय स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है जो पहले घाटे और ऋण को कम करने के तरीकों द्वारा राज्य-प्रभुत्व के अधीन था।
  • निजीकरण के माध्यम से राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों को किया जाने वाला शुद्ध हस्तांतरण कम किया जाता है।
  • यह सामान्य रूप से उद्योग के प्रदर्शन-बेंचमार्क को बढ़ाने में मदद करता है।
  • इसका शुरू में कर्मचारियों पर अवांछनीय प्रभाव पड़ सकता है लेकिन धीरे-धीरे लंबी अवधि में, कर्मचारियों की वृद्धि और समृद्धि के लिए फायदेमंद साबित होगा।

निजीकरण के नुकसान:

  • निजी क्षेत्र, लाभ-अधिकतमकरण पर अधिक ध्यान देता है, और सार्वजनिक क्षेत्र के विपरीत सामाजिक उद्देश्यों पर कम ध्यान देता है, और यही आपात स्थिति और महत्ताओं के मामले में सामाजिक रूप से व्यवहार्य समायोजन शुरू करता है।
  • निजी क्षेत्र में पारदर्शिता का अभाव है और हितधारकों को उद्यम की कार्यक्षमता के बारे में पूरी जानकारी नहीं मिलती है।
  • निजीकरण ने सरकारी और निजी बोलीदाताओं को लाइसेंस और व्यावसायिक सौदों की उपलब्धियों के भ्रष्टाचारयुक्त और नाजायज तरीकों को अनावश्यक समर्थन प्रदान किया है। लॉबिंग और रिश्वत वे आम मुद्दे हैं जो निजीकरण की व्यावहारिक प्रयोज्यता को धूमिल करते हैं।
  • निजीकरण उस मिशन या उद्देश्य को खो देता है जिसके साथ उद्यम स्थापित किया गया था, और लाभ अधिकतमकरण एजेंडा ही कम गुणवत्ता वाले उत्पादों के उत्पादन, छिपी हुई अप्रत्यक्ष लागतों, मूल्य वृद्धि आदि को प्रोत्साहित करता है।
  • निजीकरण उच्च कर्मचारी-टर्नओवर में परिणत होता है, और इतना ही नहीं कम-योग्य कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने और यहां तक कि नवीनतम व्यावसायिक प्रथाओं के साथ PSU की मौजूदा जनशक्ति बनाने के लिए बहुत सारे निवेश की आवश्यकता होती है।
  • हितधारकों और खरीदार निजी कंपनी के प्रबंधन के बीच हितों का टकराव हो सकता है; और परिवर्तन के लिए प्रारंभिक प्रतिरोध उद्यम के प्रदर्शन में बाधा डाल सकता है।
  • निजीकरण मूल्य मुद्रास्फीति को सामान्य रूप से बढ़ाता है क्योंकि सौदे के बाद निजीकृत उद्यम सरकार-सब्सिडी का आनंद नहीं ले पाते हैं, और इस मुद्रास्फीति का बोझ आम आदमी को प्रभावित करता है।

PSB के निजीकरण की आवश्यकता:

  • NPA : वित्तीय प्रणाली, गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (NPA) के अतिभार का सामना कर रही है और इसका अधिकांश सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में है।
  • दोहरे नियंत्रण का मुद्दा: RBI (RBI अधिनियम, 1934 के तहत) और वित्त मंत्रालय (बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत) का PSB पर दोहरा नियंत्रण है।
  • नतीजतन, RBI के पास ऐसी कोई भी शक्ति नहीं है जो इसके पास निजी क्षेत्र के बैंकों के लिए हैं, जैसे कि बैंकिंग लाइसेंस को रद्द करने की शक्ति।
  • बैंक का विलय करना, बैंक बंद करना, या निदेशक मंडल को दण्डित करना।
  • स्वायत्तता का अभाव: सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंक-बोर्डों का अभी भी ठीक से व्यावसायिकरण नहीं किया गया है, क्योंकि बोर्ड की नियुक्तियाँ अभी भी सरकार द्वारा की जाती हैं (जैसा कि बैंक ब्यूरो बोर्ड पूरी तरह कार्यात्मक नहीं है)। यह राजनीतिकरण और बैंकों के दैनिक कार्यों में हस्तक्षेप के बारे में सवाल उठाता है।
  • विभेदक प्रोत्साहन: विभिन्न प्रोत्साहन निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संचालित करते हैं। निजी बैंक, उदाहरण के लिए, लाभ-चालित हैं, जबकि PSB के व्यवसाय को सरकारी योजनाओं जैसे कि कृषि ऋण माफी से बाधित किया जाता है।
  • साथ ही, निजी क्षेत्र के बैंकों में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी की अनुपस्थिति, जैसे कि पंजाब नेशनल बैंक प्रकरण, को बैंकों पर शेयरधारकों के प्रभावी नियंत्रण द्वारा समझा जा सकता है।

PSB के निजीकरण के संबंध में प्रमुख चिंताएं:

  • शासन: भारतीय बैंकिंग में एक बड़ी समस्या पर्याप्त प्रशासन की कमी है, जो सार्वजनिक और निजी दोनों संस्थाओं को प्रभावित करती है।
  • PSB के मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप देके जाते हैं, जबकि निजी बैंक अपने प्रमोटरों के हित सुनिश्चित करने के लिए दुर्भावना से ग्रस्त होते हैं।
  • यस बैंक की दुर्दशा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय बैंकिंग की समस्याएं स्वामित्व के मुद्दों से परे हैं।
  • राजनीतिक जोखिम: एक निजीकरण कार्यक्रम में कई चुनौतियां निहित होती हैं, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हर सरकार कुछ गंभीर राजनीतिक जोखिमों का सामना करती है।
  • नीतियों के साथ मुद्दा: RBI द्वारा शुरू की गई पुनर्गठन योजनाएं जैसे कॉर्पोरेट ऋण पुनर्गठन, रणनीतिक ऋण पुनर्गठन और तनावग्रस्त परिसंपत्तियों की स्थायी संरचना के लिए योजनाएं, खराब ऋणों की पहचान में देरी के मुख्य कारण हैं फिर भले ही बैंक स्वामित्व (सार्वजनिक या निजी) कैसा भी हो।
  • अनाकर्षक अधिग्रहण लक्ष्य: बैंक, प्रत्येक निजी क्षेत्र की कंपनी के लिए अधिग्रहण लक्ष्यों को अनाकर्षक कर रहे होंगे, क्योंकि उनमें से कई के पास खराब ऋण पुस्तिकाएं हैं।
  • सरकार को निश्चित रूप से उनके लिए एक उचित मूल्य नहीं मिलेगा, जो संभावित रूप से राजनीतिक विपक्ष से हमलों के रूप में परिणत होगा; यदि अच्छा भाग्य रहा तो कुछ मामलों में, शायद कुछ कीमत मिल जाय।
  • यह भी उल्लेखनीय है कि कई बैंकों में बड़े पैमाने पर अति-कर्मचारी कार्यरत हैं या ये बैंक, उन श्रमिकों को नियुक्त करते हैं जिनकी उत्पादकता निम्न है; किसी भी धारक के लिए इस अधिशेष कार्य का निपटान मुश्किल है।
  • यही कारण है कि थोक निजीकरण के लिए किसी भी प्रस्ताव को राजनीतिक विरोध के साथ साथ बैंक कर्मचारी समूहों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।
  • यह कोई रामबाण नहीं: RBI के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन का मानना है कि निजीकरण बैंकिंग क्षेत्र की समस्याओं को तब तक ठीक नहीं करेगा जब तक कि इसमें नियामक सुधारों का पालन नहीं किया जाता है।
  • नियामकों का विफल होना: जबकि RBI का PSB पर समान स्तर का नियंत्रण नहीं है जैसा कि इसका निजी बैंकों पर है, फिर भी यह स्पष्ट नहीं करता है कि RBI, PSB को पूंजी पर्याप्तता, धोखाधड़ी नियंत्रण या उचित वित्तीय रिपोर्टिंग जैसे मुद्दों के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं बना सकता है । RBI अधिनियम के तहत, RBI, बैंकों को नियंत्रित करने के लिए अच्छी तरह से सुसज्जित है।
  • सामाजिक न्याय के लिए एक उपकरण के रूप में PSB: PSB कई कल्याणकारी पहल जैसे कि वित्तीय समावेशन, कृषि ऋण माफी और ऐसे अन्य कार्य करके सामाजिक न्याय के लिए एक उपकरण के रूप में काम करता है।

भारत के लिए भावी संभावनाएं:

  • वैश्वीकरण, उदारीकरण और निजीकरण आर्थिक नीतियों के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक जनादेश हैं। बाजार उन्मुख सुधार सतत हैं, और लक्ष्य उन्मुख प्रबंधन और देश के सामाजिक और भौतिक बुनियादी ढांचे में सार्वजनिक धन के निपटान के माध्यम से, ये बढ़ी हुई दक्षता जैसे लाभों के कारण निजीकरण के प्रतिरोध के साथ स्वीकृति प्राप्त कर रहे हैं।
  • निजीकरण ने बैंकिंग, बीमा, दूरसंचार, बिजली, नागरिक उड्डयन आदि क्षेत्रों के विकास में शानदार परिणाम दिखाए हैं।
  • घरेलू सर्किट में लॉबिंग, वर्तमान समय में भारतीय अर्थव्यवस्था में चकित करने वाले हुए उलटफेर से दुर्बल हुई थी।
  • नौकरशाही, लालफीताशाही, राजनीतिक अड़चनें, भ्रष्टाचार भी भारत के विकास में प्रमुख बाधा हैं जो कुशल और सस्ते श्रम व अपर्याप्त पूंजी की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करते हैं।
  • निर्माण के अधीन अधिक उदार सुधारों के साथ, निजीकरण का भविष्य उज्ज्वल प्रतीत होता है।
  • विदेशी निवेश का एक अच्छा प्रवाह और यहां तक कि घरेलू निजी खिलाड़ियों का विकास, संघर्षरत सार्वजनिक उपक्रमों का प्रभार संभालेगा और उन्हें घुमा देगा।

निष्कर्ष:

समय के साथ, भारतीय नीति निर्माताओं ने निजीकरण के बारे में अपनी रुकावटें व्यक्त की हैं और सार्वजनिक उपक्रमों में भारी पूंजी निवेश को कम करने और राज्य के स्वामित्व वाले उद्यमों की दक्षता और लाभ सृजन को बढ़ाने के लिए उदार सुधारों की रूपरेखा तैयार की है। कई क्षेत्र, जिनमें प्रवेश बाधाएं बहुत अधिक थीं, उन्हें घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों से निवेश का स्वागत करने के लिए लचीला किया गया था। निजीकरण के बाद जबरदस्त सफलता दिखाने वाले क्षेत्र बीमा, बैंकिंग, नागरिक उड्डयन, दूरसंचार, बिजली आदि हैं। हालांकि, पूर्ण निजीकरण अभी भी एक सपना है। अधिकांश उदारीकृत क्षेत्रों में, सरकारी नियंत्रण अभी भी स्पष्ट है; और सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों के बीच प्रतिनिधिमंडल या संयुक्त उपक्रम अधिक देखे जा सकते हैं, जैसे कि मारुति सुजुकी आदि।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

निजीकृत बैंकों ने कुछ वित्तीय प्रदर्शन और दक्षता मानकों के संबंध में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। कथन को स्पष्ट करें।