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ओडिशा में कॉफी की जैविक खेती - कैसे जैविक कॉफी जनजातीय समुदायों के जीवन को बदल रही है?

Organic Coffee Farming in Odisha – How organic coffee is transforming lives of Tribal communities?

प्रासंगिकता:

जीएस 3 II अर्थव्यवस्था II उद्योग II प्रमुख उद्योग

सुर्खियों में क्यों?

ओडिशा के कोरापुट जिले में कॉफ़ी की जैविक खेती आदिवासी समुदायों के जीवन को बदल रही है।

वर्तमान संदर्भ:

  • कॉफी क्षेत्र में उगाए गए कई प्रकार के मसाले और फल आदिवासी किसानों की आय में विविधता लाते हैं।
  • बहुत पुरानी बात नहीं है जब, सूर्य छौटिया, ओडिशा के कोरापुट जिले के गोलूर गांव के 100 एकड़ के कॉफी बागानों पर सारे प्रयास हार चुका था। वृक्षारोपण पर ध्यान नहीं दिया गया था, और उपज भी थोड़ी ही थी।

भारत में कॉफी उद्योग:

परिचय:

  • आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण, गैर-अल्कोहल उत्तेजक पेय-कॉफी, विश्व बाजार में दूसरा सबसे बड़ा कारोबार होने वाला उत्पाद है, जो पेट्रोलियम / कच्चे तेल के बाद दूसरे स्थान पर है।
  • इसके समृद्ध और अद्वितीय स्वाद, सुगंध और स्वास्थ्य लाभों के कारण दुनिया की अधिकांश आबादी कॉफी का सेवन करती है। यह अनुमान है कि 52 कॉफी निर्यातक देशों में 25-30 मिलियन परिवार अपनी आजीविका के लिए कॉफी उत्पादन पर निर्भर हैं।
  • भारत में, मुख्य रूप से दो प्रकार की कॉफी की किस्में उगाई जाती हैं: अरेबिका और रोबस्टा। भारत में उत्पादित कुल कॉफी में से 70 प्रतिशत का निर्यात किया जाता है और 30 प्रतिशत का घरेलू उपयोग किया जाता है।
  • विश्व स्तर पर, ब्राजील, वियतनाम, कोलंबिया, इंडोनेशिया, मैक्सिको, इथियोपिया, ग्वाटेमाला, भारत, मैक्सिको और युगांडा कुछ प्रमुख कॉफी उत्पादक देश हैं।

भारत में कॉफी क्षेत्र:

ऑन-फार्म (खेत पर) की चुनौतियां-

  • मिट्टी और जलवायु संबंधी आवश्यकताएं: भारत में, कॉफी उगाने वाले क्षेत्रों को पारंपरिक और गैर-पारंपरिक में वर्गीकृत किया गया है। पारंपरिक कॉफी क्षेत्रों में कर्नाटक, केरल और तमिल नाडु शामिल हैं, जो मुख्य रूप से पश्चिमी घाट में फैले हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा और कुछ उत्तर पूर्वी राज्यों में गैर-पारंपरिक कॉफी उत्पादक क्षेत्र हैं।
  • मुख्य रूप से, कॉफी एक उष्णकटिबंधीय पौधा है जिसे अर्ध-उष्णकटिबंधीय जलवायु में भी उगाया जाता है। कॉफी को अपने फसल चक्र के विभिन्न चरणों में गर्मी, आर्द्रता और प्रचुर वर्षा के विभिन्न स्तरों की आवश्यकता होती है।
  • जल प्रबंधन: कॉफी एक अत्यंत जल-संवेदनशील फसल है और अपेक्षित पैदावार प्राप्त करने के लिए इसके महत्वपूर्ण विकास चरणों जैसे खिलने से पूर्व, खिलने के बाद, फलने और परिपक्वता के दौरान पानी की आवश्यकता होती है। जल संसाधनों की उपलब्धता और सिंचाई के सामान की खरीद और स्थापना कई कॉफी खोतों के लिए कुछ बड़ी चुनौतियां हैं।
  • फसल प्रणालियां: कॉफी के खेतों में बहु-स्तरीय फसल प्रणालियां, उत्पादकों को अतिरिक्त आय प्रदान करती हैं और खराब कॉफी वर्ष के दौरान बफर फसलों के रूप में काम करती हैं।
  • मशीनीकरण के लिए गुंजाइश: कॉफी एक बारहमासी फसल है, इसके फसल चक्र के दौरान निरंतर देखभाल की आवश्यकता होती है। भारत और अन्य जगहों पर, कॉफी बागान आमतौर पर पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं जहां परिष्कृत कृषि मशीनरी का उपयोग करने के लिए कम अवसर होते हैं।
  • पोषक तत्व प्रबंधन: हालांकि कॉफी के पौधों के लिए मिट्टी कार्बनिक पदार्थों से भरपूर होती है, लेकिन मिट्टी के pH का रखरखाव एक बड़ी चुनौती है। ढलान के कारण, अत्यधिक वर्षा के कारण मिट्टी का अधिकांश भाग बह जाता है।
  • श्रम की उपलब्धता और लागत: कॉफी की खेती एक गहन व्यवसाय है और, कॉफी की खेती में मशीनीकरण की कम गुंजाइश होने के कारण, रोपण, झाड़ी प्रबंधन, निषेचन, निराई, सिंचाई, कटाई और प्रसंस्करण जैसे महत्वपूर्ण कृषि कार्यों के दौरान श्रम लागत हाल के वर्षों में बढ़ी है।
  • प्रसंस्करण के तरीके: भारत में कॉफी बीन्स के प्रसंस्करण के लिए मूल रूप से दो लोकप्रिय (गीले और सूखे) तरीके हैं, और वे परिणामी कॉफी की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकते हैं।
  • सुखाना और भंडारण सुविधाएं: सुखाना सबसे महत्वपूर्ण मानदंडों में से एक है जो कॉफी बीन्स के शेल्फ जीवन को निर्धारित करता है।
  • नमी प्रबंधन, अपशिष्ट प्रबंधन और प्रदूषण उन्मूलन भी कुछ चुनौतियां हैं।

ऑफ़-फार्म (खेत से बाहर) की चुनौतियां-

  • संयंत्र की क्षमता, सुखाने की सुविधा और नमी प्रबंधन: भारत में क्योरिंग (curing) कारखाने बहुत सीमित हैं। क्योरिंग कारखानों के लिए प्रवेश स्तर की नमी की जांच चुनौतीपूर्ण कार्य है, क्योंकि प्राप्त की गई कॉफी की खेंप प्रकृति में विषम होगी।
  • धूल नियंत्रण, भंडारण क्षमता और विधियाँ: कॉफ़ी के क्योरिंग कारखानों में धूल का जमाव एक बड़ी समस्या है। विभिन्न ऑपरेशन – जैसे कि छिलके उतारना, पत्थर या कंकर निकालना और पॉलिश करना – बड़े पैमाने पर धूल का निर्माण करते हैं जो मोल्ड संदूषण का एक संभावित स्रोत है।
  • कॉफी दोष और माइकोटॉक्सिन संदूषण: ’दोष’ वह सामूहिक शब्द है जिसका उपयोग थोक ग्रीन कॉफ़ी में पाए जाने वाले अवांछनीय कणों के लिए किया जाता है। क्योरिंग कारखानों में, दोषपूर्ण कॉफी को मुख्य स्वच्छ कॉफी से अलग रखना पड़ता है; अन्यथा, कॉफी दोष से क्रॉस-संदूषण की एक उच्च संभावना होती है।
  • अपशिष्ट निपटान: कॉफी की क्योरिंग से भारी मात्रा में अपशिष्ट पैदा होता है। इस कचरे को बिना किसी उपचार के या सुरक्षात्मक उपायों के अभाव में क्योरिंग कारखानों में डंप कर दिया जाता है।
  • नमी प्रबंधन और पैकेजिंग के तरीके: क्योर की जा चुकी कॉफी को क्योरिंग कारखानों से शिपमेंट के लिए बंदरगाहों तक पहुंचाया जाता है। भंडारण कंटेनर में नमी बढ़ने से, मोल्ड संदूषण को तो आमंत्रित करती ही है साथ ही, कॉफी की गुणवत्ता में भौतिक और रासायनिक परिवर्तन होते हैं।
  • शिपमेंट में देरी: लोडिंग और शिपमेंट के बीच की देरी को न्यूनतम रखा जाना चाहिए। शिपमेंट के दौरान, पर्याप्त देखभाल की जानी चाहिए।
  • विपणन और निर्यात चुनौतियां: कॉफी उत्पादन, कॉफी उत्पादन श्रृंखला में प्रमुख और अंतिम गतिविधि है। विपणन कई कारकों पर निर्भर करता है, जैसे कि मांग, अंतर्राष्ट्रीय बाजार में चल रही कीमत, उपभोक्ता प्राथमिकताएं और व्यापार बाधाएं।

पारिस्थितिकी तंत्र सेवा और पर्यावरण संबंधी समस्याएं:

  • मिट्टी की उर्वरता में गिरावट और पुनर्स्थापन: उर्वरकों, संरक्षण रसायनों और अन्य विकास हार्मोनों के अंधाधुंध उपयोग के कारण होने वाले निक्षालन (लीचिंग) के माध्यम से मिट्टी बीमार हो जाती है।
  • मृदा और जल प्रदूषण- अपशिष्ट निपटान और इसके पारिस्थितिक प्रभाव: कॉफी अपशिष्ट घटकों में मुख्य रूप से लिग्निन और सेलूलोज़ अपशिष्ट शामिल हैं, जिनका उपयोग जैविक उर्वरक के रूप में भी किया जा सकता है। हालांकि, कृषि क्षेत्रों में कॉफी कचरे के प्रत्यक्ष उपयोग से गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं हो सकती हैं।
  • जैव विविधता संरक्षण: भारत में कॉफी एग्रोफोरेस्ट्री प्रणाली, कई स्थायी छाया वृक्षों का संरक्षण करती है जो स्थानीय और प्रवासी पक्षियों, जंगली जानवरों, माइक्रो और मीसोफौना और माइक्रोबियल विविधता को समर्थन प्रदान करते हैं।
  • कॉफी बागानों में छायादार वृक्षों का संरक्षण (वनों की कटाई और वनीकरण): भारत में लगभग 50 विभिन्न प्रकार के छायादार वृक्ष कॉफी बागानों में पाए जाते हैं।

भारत में कॉफी उद्योग से लाभ:

  • यह कई छोटे किसानों और हाशिए के किसानों के लिए कमाई का जरिया है।
  • भारत के अधिकांश चाय बागान पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख स्रोत हैं।
  • भारत एशिया में कॉफी का तीसरा सबसे बड़ा उत्पादक और निर्यातक है, वैश्विक कॉफी उत्पादन में देश का 3.30 प्रतिशत (2017-18) का योगदान है।
  • रोबस्टा कॉफी का सबसे बड़ा निर्यातक ओलम एग्रो इंडिया प्राइवेट लिमिटेड है, जो 17,640 टन या 31 मिलियन रोबस्टा कॉफी निर्यात करता है।
  • सबसे बड़ा आयातक इटली है और वह भी रोबस्टा कॉफी के लिए।
  • अन्य प्रमुख आयातक देश जर्मनी, रूस और बेल्जियम हैं।
  • बेल्जियम अरेबिका कॉफी का सबसे बड़ा आयातक है।

सरकार के लिए चुनौतियां:

  • वैश्विक मूल्य में उतार-चढ़ाव, बाजार की अस्थिरता, और बाजार संबंधी जानकारी: ब्राजील, वियतनाम और कोलंबिया वैश्विक कॉफी उत्पादन में लगभग 55% का योगदान देते हैं। इन तीन देशों के उत्पादन और आपूर्ति की गतिशीलता, विश्व बाजार में कॉफी की कीमत तय करती है। जब मुक्त व्यापार नीति के तहत निर्यात पर मात्रात्मक प्रतिबंध हटा दिए गए, तो ब्राजील और कोलंबिया से कॉफी भारत में पहुंचने लगी, जिससे स्थानीय शुल्क की कीमतें प्रभावित हुईं।
  • फार्म वित्त और सब्सिडी: कॉफी की खेती में सरकार के लिए मुख्य चुनौती बड़ी संख्या में कॉफी उत्पादकों को कृषि वित्त और सब्सिडी प्रदान करना है। फार्म फाइनेंस और सब्सिडी का उद्देश्य कॉफी उत्पादकों को कृषि कार्यों के मशीनीकरण के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देना है।
  • गुणवत्ता के मुद्दे और प्रमाणन: भारतीय कॉफी बोर्ड, किसान सेवाओं जैसे इको प्रमाणन और कार्बनिक प्रमाणन में भी लगे हुए थे, ताकि कॉफी उत्पादकों को उच्च रिटर्न के लिए गुणवत्ता में सुधार कर उच्च ‐ मूल्य विशेषता बाजारों तक पहुंच में सुधार के लिए प्रोत्साहित किया जा सके।
  • भारत WTO की सैनिटरी और फाइटोसैनिट्री (SPS) समझौते के लिए हस्ताक्षरकर्त्ता है। भारत (कॉफी बोर्ड ऑफ इंडिया) अपनी अनुसंधान और विश्लेषणात्मक सेवाओं के माध्यम से कॉफी उत्पादन श्रृंखला से संबंधित सभी खाद्य सुरक्षा मुद्दों का ध्यान रखता है।
  • अनुसंधान और विस्तार सेवाएं: भारत में, कॉफी उत्पादन और इसकी आपूर्ति श्रृंखला के लिए प्रासंगिक अनुसंधान, विकास और विपणन गतिविधियां, भारतीय कॉफी बोर्ड (वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय) के प्रत्यक्ष नियंत्रण में आती हैं, जिसे संसद के अधिनियम द्वारा एक स्वायत्त संस्थान के रूप में स्थापित किया गया है।
  • संवर्धन और विपणन: कॉफ़ी उत्पादकों को कॉफ़ी के संग्रह, भंडारण और कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया द्वारा प्रदान की गई क्योरिंग इकाइयों और गोदामों तक उनके परिवहन जैसी बाजार सहायता सेवाओं से लाभ हुआ है।

सरकारी नीतियां

  • सरकार की नीतियां करों और अन्य शुल्कों के संदर्भ में बदलती रही हैं। कुछ साल पहले, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि क्योर की गई कॉफ़ी विनिर्मित कॉफी के तहत आती है और इसलिए यह केंद्रीय आयकर (CIT) के लिए उत्तरदायी हो सकती है। छोटे कॉफी उत्पादकों पर इसका अपेक्षित प्रभाव पड़ा।
  • उन्होंने इंडियन कॉफी ट्रेडर्स एसोसिएशन द्वारा नीलामी से बचना शुरू कर दिया। कई उत्पादक राज्य कृषि आयकर के साथ ही संतुष्ट थे, क्योंकि वह एकड़ के हिसाब से लगाया जाता है और संकट के समय में नियमित रूप से माफ कर दिया जाता है।

निष्कर्ष:

भारत दुनिया में अग्रणी कॉफी उत्पादकों में से एक है, लेकिन दुनिया में अग्रणी उपभोक्ता नहीं है। निर्यात में अनिश्चितताओं और कठिनाइयों को ध्यान में रखते हुए अधिक घरेलू खपत को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। भारत में, कॉफी उद्योग पश्चिमी और पूर्वी घाटों के वन पारिस्थितिक तंत्र के संरक्षण में एक बड़ी भूमिका निभाता है, इसके अलावा राष्ट्रीय (और विदेशी) खजाने में योगदान देता है, और आबादी के एक बड़े हिस्से को रोजगार भी प्रदान करता है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

भारतीय कॉफी उद्योग का वैश्विक कॉफी उद्योग में महान योगदान है। भारत में कॉफी उद्योग से संबंधित ऑन-फार्म और ऑफ-फार्म की क्या चुनौतियां हैं। स्पष्ट कीजिए।