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अनुच्छेद 142 के तहत सर्वोच्च न्यायालय की विशेष शक्तियां

Special Powers of Supreme Court under Article 142

प्रासंगिकता:

  • जीएस 2 || राजसत्ता || न्यायपालिका || उच्चतम न्यायालय

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने मणिपुर के एक मंत्री को हटाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया।

विवरण

  • सुप्रीम कोर्ट ने राज्य मंत्रिमंडल से थुनाओजम श्यामकुमार सिंह को हटा दिया और उन्हें “अगले आदेश तक विधान सभा में प्रवेश करने पर रोक लगा दी।”
  • मंत्री के खिलाफ 2017 से एक अयोग्य याचिका स्पीकर के पास लंबित थी, लेकिन स्पीकर उचित समय रहते मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने में विफल रहे।
  • सुप्रीम कोर्ट ने 21 जनवरी 2020 को स्पीकर को मंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए 4 सप्ताह का वक्त दिया था, लेकिन स्पीकर ऐसा नहीं कर पाए।
  • संविधान के अनुच्छेद 212 के तहत न्‍यायालयों द्वारा विधानमंडल की कार्यवाहियों की जांच नहीं की जा सकती, लेकिन जब स्पीकर इस प्रकार के मामलों में कार्रवाई नहीं करता है, तब सुप्रीम कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 142 की शक्तियों का इस्तेमाल करना होता है।
  • इससे पहले, मणिपुर उच्च न्यायालय ने भी इस मामले में, दसवीं अनुसूची के तहत मंत्री को अयोग्य पाया था, लेकिन कोई निर्देश जारी नहीं किया।
  • कारण- अब सवाल उठता है कि क्या उच्च न्यायालय एक समय सीमा के भीतर अयोग्य ठहराये जाने वाली याचिका के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए स्पीकर को निर्देश दे सकता है।

21 जनवरी 2020 का आदेश

  • सामान्य तौर पर अदालत ने कहा कि “स्पीकर, दसवीं अनुसूची के तहत एक न्यायाधिकरण के रूप में कार्य करने के लिए, एक उचित अवधि के भीतर अयोग्य याचिकाएं तय करने के लिए बाध्य है,” जो कि मामले के तथ्यों पर निर्भर करेगा।”
  • उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा कि दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्य ठहराए जाने वाली याचिकाओं को संसद या विधानसभाओं के बाहर एक तंत्र द्वारा स्थगित किया जाना चाहिए।
  • न्यायालय ने एक स्थायी ट्रिब्यूनल का सुझाव दिया है जो एक सेवानिवृत्त सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में एक नया तंत्र है। हालांकि, इसके लिए संविधान में संशोधन की आवश्यकता होगी।
  • वर्तमान में, किसी सदन / विधानसभा के सदस्यों की अयोग्यता को लेकर स्पीकर को ही निर्णय लेना होता है।
  • न्यायालय अपने तर्क से यह सुनिश्चित करना चाहते थे कि इस तरह के विवादों को तेजी से और निष्पक्ष रूप से तय किया जाना चाहिए।

अनुच्छेद 142

  • यह सर्वोच्च न्यायालय को विवेकाधीन शक्ति प्रदान करता है।
  • इसमें कहा गया है कि सर्वोच्च न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत ऐसा कोई भी आदेश दे सकता है या पूर्ण न्याय करने के लिए जरूरी समझते हुए सुप्रीम कोर्ट इस प्रकार के आदेश दे सकता है।

दल बदल विरोधी कानून  (Anti-Defection Law ) के संबंध में अध्यक्ष की शक्तियां

  • दल बदल से उत्पन्न अयोग्यता के सवाल पर निर्णय सदन का पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है।
  • हालांकि, वर्ष 1993 के किहोतो होलोहन मामले में उच्चतम न्यायालय ने फैसला देते हुए कहा था कि विधानसभा अध्यक्ष का निर्णय अंतिम नहीं होगा, इसे कोर्ट में लाया जा सकता है।
  • इस प्रकार के मामले न्यायिक समिक्षा के अंतर्गत आते हैं।

10वीं अनुसूची के तहत अयोग्यता

  • देश की राजनीति में दल बदल बुराई के खिलाफ लड़ने के लिए भारतीय संविधान की 10वीं अनुसूची को संविधान में 52वें संशोधन के बाद जोड़ा गया।
  • इसके अनुसार, किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित सदन के सदस्य को अयोग्य ठहराया जा सकता है, जब वह
  • वह स्वेच्छा से ऐसी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है; या
  • यदि वह उस सदन में अपने राजनीतिक दल के निर्देशों के विपरीत मत देता है या मतदान में अनुपस्थित रहता है तथा राजनीतिक दल से उसने पंद्रह दिनों के भीतर क्षमादान न पाया हो।

दल बदल अयोग्यता के मामले में अपवाद

  • यदि कोई सदस्य अपनी पार्टी छोड़कर किसी अन्य पार्टी में शामिल हो जाता है।
  • एक विलय तब होता है जब पार्टी के दो-तिहाई सदस्य इस तरह के विलय के लिए सहमत हो जाते हैं।
  • लोकसभा एवं विधानसभा के अध्यक्ष और राज्यसभा का उपसभापति चाहे तो अपने निर्वाचन के पश्चात् अपनी पार्टी से इस्तीफा दे सकते हैं। किन्तु एक बार इस्तीफा देने के बाद पद पर रहते हुए वे पुनः पार्टी में शामिल होते हैं तो अयोग्य घोषित किये जाते हैं। इसका निर्णय पीठासीन अधिकारी करेगा।

संदर्भ: