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में गिद्ध संरक्षण - गिद्ध जनसंख्या में गिरावट के कारण और परिणाम

Vulture Conservation in India – Causes and consequences of decline in Vulture population

प्रासंगिकता:

जीएस 3 II पर्यावरण II जैव विविधता II संरक्षण प्रयास

विषय: भारत में गिद्ध संरक्षण – गिद्ध जनसंख्या में गिरावट के कारण और परिणाम

सुर्खियों में क्यों?

कई सालों तक, शोधकर्ताओं ने यह समझने के लिए ही संघर्ष किया गिद्ध की मौतों का कारण क्या हो सकता है।

परिचय:

  • चार्ल्स डार्विन ने सोचा था कि गिद्ध “घृणित” थे। मानवीय दृष्टिकोण से, शायद वे हों भी, लेकिन गिद्ध प्रकृति के सबसे सफाईकर्त्ता हैं, और वे हमें पारिस्थितिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सेवाओं की एक विस्तृत श्रृंखला प्रदान करते हैं। विशेष रूप से, गिद्ध सड़े हुए और अन्य कार्बनिक अपशिष्ट निपटाते हैं, और हमें एक मुफ्त और अत्यधिक प्रभावी स्वच्छता सेवा प्रदान करते हैं।
  • गिद्ध-शासित सफाई सेवा मनुष्यों, पालतू जानवरों और वन्यजीवों के स्वास्थ्य की रक्षा करती है क्योंकि गिद्धों के बिना अन्य ऐसे सफाईकर्त्ताओं, जिनमें से अधिकतर रोगों का भण्डार होते हैं, की मृत जीवों के आसपास बहुतायत हो जाती है।
  • भारत ने गिद्ध संरक्षण के लिए 2004 में एक IUCN प्रस्ताव भी पारित किया, जिसे IUCN संकल्प के रूप में स्वीकार किया गया था, इसमें जिप्स वल्चर रेंज देशों का आह्वान किया गया था कि वे पशु चिकित्सा अनुप्रयोगों में डाइक्लोफेनाक के सभी उपयोगों को रोकने के लिए कार्रवाई शुरू करें जो गिद्धों के लिए भोजन के रूप में उपलब्ध मृत घरेलू पशुधन में डाइक्लोफेनाक की उपस्थिति को अनुमति देता है;
  • IUCN के तत्वावधान में IUCN दक्षिण एशियाई टास्क फोर्स की स्थापना जिसके तहत रेंज देश संरक्षण और प्रजनन सहित राष्ट्रीय गिद्ध पुनर्प्राप्ति योजनाओं को विकसित और कार्यान्वित करेंगे।
  • भारतीय उपमहाद्वीप में जिप्स गिद्धों की जनसंख्या की स्थिति: गिद्धों की जनसंख्या स्थिति पर सर्वेक्षण किए गए हैं और विभिन्न एवियन विशेषज्ञों द्वारा उनके अचानक गिरावट के कारणों का अध्ययन भी किया गया है।
  • भारत में गिद्धों की आबादी का दायरा पहली बार कियोलाडो घाना राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान में 1980 के दशक के मध्य से 1990 के दशक के मध्य तक दर्ज किया गया था, इसके बाद उत्तरी भारत सड़कों पर गणना की गई थी।
  • भारत में 12 साल की अवधि में 97% से अधिक की गिरावट का अनुमान लगाया गया है; और पाकिस्तान में 3 साल की अवधि में 92% (विरानी, 2006) गिरावट देखी गई। नेपाल ने भी इसी तरह की गिरावट का अनुभव किया है।
  • रुग्णता के लक्षण: यूरेशियन गिद्धों में पाई गई गर्दन लटकने की घटना, गिरावट की अवधि से पहले भारत में कभी नहीं देखी गई थी।
  • ‘गर्दन लटकने’ की घटना पहली बार कियोलाडो राष्ट्रीय उद्यान में देखी गई थी, जहां पक्षी पेड़ों के गिरने से पहले, या मृत्यु से ठीक पहले, कई हफ्तों तक लंबी अवधि के लिए इस व्यवहार को प्रदर्शित कर रहे थे।

गिरावट के कारण:

  • गिद्ध की आबादी में गिरावट कई कारकों के कारण हो सकती है – अवैध शिकार, महामारी, निवास स्थान विनाश – लेकिन इनमें से कोई भी कारण, पूरे दक्षिण एशिया में गिरावट की ऐसी गति, पैमाने और विस्तार को समझा नहीं सका।
  • गिद्धों की आबादी में अचानक कमी का संभावित कारण: एशियाई गिद्ध जनसंख्या दुर्घटना पहली बार 1999 में गिरावट के कारण की जांच के साथ सामने आई थी। भारत में, जनसंख्या में भारी गिरावट के लिए प्रारंभिक परिकल्पना भोजन की अनुपलब्धता (मृत पशुधन) मानी गई थी क्योंकि वे शायद वाणिज्यिक उद्देश्यों से बाहर कर दिये गये थे या किसी अज्ञात वायरल महामारी रोग के कारण मर रहे थे।
  • संभावित कारण के रूप में डिक्लोफेनाक की पहचान: एक वैकल्पिक परिकल्पना, पर्यावरण में एक नए जोखिम कारक की शुरूआत से मानी गई थी। गिद्ध आबादी में गिरावट की शुरुआत से ठीक पहले पक्षी जिसके शिकार हो रहे थे।
  • पशु चिकित्सा एनल्जेसिक दवा डिक्लोफेनाक, जिसे उपमहाद्वीप में 1980 के दशक के अंत में पशु चिकित्सा के उपयोग के लिए पेश किया गया था, और गिद्धों द्वारा ऐसे मृत पशुधन का भक्षण जिनका उपचार डाइक्लोफेनाक द्वारा किया गया था, बताता है कि गिद्धो में अन-मेटाबोलाइज्ड डिक्लोफेनाक की पर्याप्त सांद्रता का कारण रहा।
  • प्रयोगों से पता चला कि बंदी बनाये गये गिद्ध डाइक्लोफेनाक के लिए अतिसंवेदनशील थे, और एक वे एक ऐसे जानवर के शव को खाने के थोड़े समय के अंदर ही गुर्दों की विफलता के कारण मर गये जिनका डाइक्लोफेनाक की सामान्य खुराक के साथ उपचार किया गया था।
  • डायक्लोफेनैक के सस्ते और कई सूत्र, पाकिस्तान, भारत और नेपाल में व्यापक रूप से उपलब्ध हैं जो नियमित रूप से पशुधन के इलाज के लिए उपयोग किए जाते हैं। मॉडलिंग के परिणाम बताते हैं कि मृत जीवों के डाइक्लोफेनाक से दूषित होने की बहुत कम दर से ही क्षेत्र में भारी गिरावट आ सकती है, और सर्वेक्षणों से पता चला है कि वह स्तर मौजूद है।

गिरावट के परिणाम:

  • ऐच्छित सफाई सेवा प्रदाताओं के ये समुदाय अत्यधिक संरचित (यादृच्छिक नहीं) और जटिल हैं, और पक्षियों का इस संरचना में सबसे अधिक योगदान है क्योंकि वे सफाई करने में विशेषज्ञ हैं।
  • स्थानीय क्षेत्रों में जहां गिद्ध कार्यात्मक रूप से विलुप्त हो रहे हैं, जैसे कि भारत में, शवों पर गिद्धों की अनुपस्थिति ने जंगली कुत्तों और चूहों जैसे अवसरवादी प्रजातियों की बहुतायत में तेजी से वृद्धि की है।
  • जंगली कुत्तों को भोजन के लिए सीधे गिद्धों के साथ प्रतिस्पर्धा करते देखा गया है और वे शवों से गिद्धों को विस्थापित करने में भी काफी सक्षम हैं। जिम्बाब्वे में सांप्रदायिक भूमि से सटे क्षेत्रों में, शवों पर जंगली कुत्तों का अधिपत्य था, लेकिन संरक्षित क्षेत्र के अंदर, शवों पर गिद्ध मुखर थे।
  • केन्या में, गिद्धों की अनुपस्थिति में, शवों के सड़ने का समय लगभग तीन गुना बढ़ गया, और सफाई करने वाले स्तनधारी जानवरों की संख्या और शवों का भक्षण करन में खर्च किए जाने वाले समय में तीन गुना वृद्धि हुई। इसके अलावा, गिद्धों के बिना शवों का भक्षण करते स्तनधारी जानवरों के बीच संपर्कों की संख्या में लगभग तीन गुना वृद्धि हुई है, जो यह बताता है कि गिद्धों की मृत्यु से शवों पर रोग का संचरण होने की पूरी संभावना है।

एक स्वास्थ्य संकट और एक सांस्कृतिक दुविधा

  • संरक्षण से संबंधित लोगों के अलावा, कुछ लोगों ने गिद्धों की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया है। अधिकांश प्राणियों की तरह, मनुष्यों का गिद्धों के साथ एक मानसिक संबंध है।
  • भारत में, इसे जटायु के रूप में पूजा जाता है, जो कि महाकाव्य रामायण के गिद्ध देवता हैं जिन्होंने देवी सीता की रक्षा करते हुए प्राण गँवाए थे।
  • फिर भी, गिद्धों को हमेशा अरुचि के साथ देखा जाता है और मृत्यु के दूत के रूप में रुग्णता के साथ जोड़ा जाता है। आम भाषा में, एक ‘गिद्ध’ से नकारात्मक अर्थ जोड़े जाते हैं, जो किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो कमजोर लोगों पर शिकार करता है या जो दूसरों के दुर्भाग्य से लाभ उठाता है।
  • पक्षी सफाई प्रदाता के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनके द्वारा त्वरित, और मृत जीवों का कुशल निपटान घातक बैक्टीरिया को विकसित और फैलने की अनुमति नहीं देता है।
  • गिद्धों की नाटकीय गिरावट ने एक वैक्यूम बनाया, और लाखों शवों को सड़ने के लिए छोड़ दिया, जिससे टीबी, एंथ्रेक्स, ब्रुसेलोसिस, पैर और मुंह आदि जैसे रोगों के फैलने की संभावना बढ़ गई।
  • अन्य सफाई प्रदाता जैसे कि चूहों और जंगली कुत्तों ने भी अपना काम किया लेकिन उनके पास गिद्धों जैसी दक्षता नहीं है। गिद्धों का चयापचय, रोगजनकों के लिए सही अंत है। कुत्ते और चूहे, इसके बजाय, रोग फैलाने वाले रोगजनकों के वाहक बन जाते हैं।
  • गिद्धों के क्षय का एक और अप्रत्याशित परिणाम भी सामने आया। गिद्धों की निकट विलुप्ति के कारण, पारसी समुदाय के लिए अपने विशिष्ट अंतिम संस्कार अनुष्ठानों को बनाए रखना मुश्किल हो रहा है, जहां वे टावर्स ऑफ साइलेंस’ में अपने मृत परिजनों के शरीरों को छोड़ देते हैं, जिनका मुख्य रूप से गिद्ध सेवन करते हैं।
  • व्हाइट रंप्ड गिद्धों की आबादी में गिरावट 43.9 प्रतिशत सालाना थी।

गिद्धों का संरक्षण- अब तक की गई कार्रवाई:

  • भारत ने 2006 में डाइक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया, क्योंकि उस वर्ष पर्यावरण मंत्रालय द्वारा शुरू की गई गिद्ध कार्य योजना ने प्रतिबंध की सिफारिश की और सुरक्षित डाइक्लोफेनाक विकल्पों की पहचान करने को भी प्राथमिकता दी।
  • पाकिस्तान और नेपाल ने समान संशोधन किए, क्योंकि दोनों देशों ने डाइक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर भी प्रतिबंध लगा दिया था।
  • पिंजौर में जटायु संरक्षण प्रजनन केंद्र (JCBC) – जो कि बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी और हरियाणा वन विभाग का एक संयुक्त प्रयास है – भारत में आठ ऐसे प्रजनन केंद्रों का प्रमुख है। यहां तीनों प्रभावित प्रजातियों के कुल 162 गिद्धों को बंदी बनाकर जेल में रखा गया है और उनका पालन पोषण किया जा रहा है।
  • पिंजौर केंद्र में, डाइक्लोफेनाक प्रतिबंध की जोरदार निगरानी की जा रही है, और इन सुरक्षित क्षेत्रों में फार्मेसियों और पशु मालिकों के साथ जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं।

और क्या किया जा सकता है?

  • गिरावट को रोकने के अन्य उपायों में अधिक सुरक्षित क्षेत्रों की स्थापना, इसके प्रजनन स्थलों की रक्षा करना शामिल है, जो अचल संपत्ति, उद्योग, बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए लगातार नष्ट किये जा रहे हैं। ऐसा एक मामला केन-बेतवा नदी को जोड़ने वाली परियोजना है, जो मध्य प्रदेश में पन्ना टाइगर रिजर्व में केन नदी के तट पर लंबे बिल वाले गिद्धों के एक महत्वपूर्ण निवास स्थल को डूबा देगी।
  • गुजरात में गिरनार वन्यजीव अभयारण्य में एक रोपवे के लिए मंजूरी दी गई है, जो गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्धों का निवास स्थल है। यह उन कुछ स्थलों में से एक है जहां गिद्धों ने अपनी आबादी में वृद्धि दर्ज की थी।
  • अन्य खतरे जो गिद्धों की पुनर्प्राप्ति को धीमा कर सकते हैं, उन पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। ट्रांसमिशन लाइन और विंड टर्बाइन को गिद्धों की आबादी में गिरावट के लिए जाना जाता है। तेंदुओं, शेरों या बाघों को निशाना बनाने वाले विष-युक्त मृत मवेशी शवों का अनजाने में बड़ी संख्या में गिद्ध शिकार करते हैं और मारे जाते हैं जैसा कि भारत और अफ्रीका दोनों में देखा गया है।

निष्कर्ष:

भारत प्रजातियों की एक विस्तृत श्रृंखला वाला देश है और प्रत्येक जीवित जीव की पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी भूमिका है, एकल कोशिका जूप्लैंकटन्स से लेकर मनुष्यों तक के लिए पारिस्थितिकी तंत्र और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने में सभी की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है। प्रत्येक प्राणी प्रकृति के संतुलन के लिए महत्वपूर्ण है इसलिए प्रत्येक जीव की सुरक्षा और उपस्थिति महत्वपूर्ण है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

दवा कंपनियों द्वारा दवा की सफलता या विफलता के लिए जानवरों का उपयोग करना बहुत पुराना अभ्यास रहा है। कई बार यह अवैध रूप से किया जाता है जो किसी भी जानवर के जीन में बीमारी फैलाने का या उत्परिवर्तन करने का एक मुख्य कारण होता है, यह नैतिक रूप से कितना गलत है। स्पष्ट करें।(200 शब्द)