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लद्दाख में भारत की पहली भूतापीय ऊर्जा परियोजना - ONGC ने लद्दाख सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

India’s first Geothermal Energy Project in Ladakh – ONGC signs MoU with Ladakh Government

प्रासंगिकता:

जीएस 3 II विज्ञान और प्रौद्योगिकी II ऊर्जा II जैव ऊर्जा

विषय: लद्दाख में भारत की पहली भूतापीय ऊर्जा परियोजना – ONGC ने लद्दाख सरकार के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

सुर्खियों में क्यों?

द ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन ने घोषणा की है कि वह लद्दाख में भारत की पहली भू-तापीय क्षेत्र विकास परियोजना स्थापित करेगा। इसके तहत स्वच्छ ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए पृथ्वी के कोर से उत्पन्न गर्मी का उपयोग किया जायगा।

वर्तमान संदर्भ:

  • लद्दाख में भारत की पहली भू-तापीय क्षेत्र विकास परियोजना।
  • कंपनी ने बताया कि ONGC एनर्जी सेंटर और केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख और लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं।

भूतापीय ऊर्जा की उत्पत्ति:

  • भू-तापीय ऊर्जा पृथ्वी की सतह से लगभग 4,000 मील नीचे पृथ्वी के कोर में उत्पन्न होती है।
  • द्वि-परतीय कोर, एक ठोस लोहे के केंद्र के आसपास बहुत गर्म तरल तह यानी मैग्मा (पिघली हुई चट्टान) से बना होता है। रेडियोधर्मी कणों के मंद्र गति से होने वाले क्षय के कारण पृथ्वी के अंदर बहुत अधिक तापमान, लगातार पैदा होता है।
  • यह प्रक्रिया सभी चट्टानों में स्वाभाविक होती है। बाहरी कोर को आच्छादित करने वाला मैंटेल होता है, जो लगभग 1,800 मील मोटा और मैग्मा और चट्टान से बना होता है।
  • पृथ्वी की सबसे बाहरी परत, वह भूमि जो महाद्वीप और महासागरीय तल बनाती है, क्रस्ट कहलाती है। महासागरों के नीचे क्रस्ट 3-5 मील मोटी और महाद्वीपों पर 15-35 मील मोटी है।

भारतीय भूतापीय संसाधन:

  • भौतिक रूप से, भारत तीन अलग-अलग भौगोलिक इकाइयों में विभाजित है – अतिरिक्त प्रायद्वीपीय क्षेत्र, भारत-गंगा का मैदान और प्रायद्वीपीय क्षेत्र।
  • इन भौगोलिक इकाइयों में आर्कियन (पुरातात्विक) से होलोसीन (अभिनव युग) तक की विभिन्न प्रकार की चट्टानें उजागर हुई हैं। थर्मल स्प्रिंग्स को विशिष्ट भू-टेक्टोनिक सेट-अप में उनकी मौजूदगी के आधार पर वर्गीकृत किया गया है और विभिन्न भू-तापीय प्रांतों के तहत भी वर्गीकृत किया गया है।
  • भूगर्भीय और संरचनात्मक मानदंड जिनका उपयोग भावी भू-तापीय प्रांत की पहचान में किया गया है, इस प्रकार हैं:
  • ऑरोजेनिक बेल्ट में इनकी मौजूदगी जो सेनोज़ोइक तह (फोल्डिंग) और उत्थान से गुजरी है
  • संरचनात्मक अवसादों में इनकी मौजूदगी जो गैर-ऑर्गेनिक बेल्ट में तृतीयक और चतुर्धातुक उत्थान के साथ जुड़ी है।
  • हाल की भूकंपीयता से जुड़े गहरे फॉल्ट जोन से संबंधित
  • तृतीयक या चतुर्धातुक ज्वालामुखी गतिविधियों के क्षेत्रों में इनकी मौजूदगी

वैश्विक परिदृश्य:

  • भू-तापीय ऊर्जा दुनिया भर में 24 देशों को 10,715 मेगावाट से अधिक की आपूर्ति करती है जिससे 67,246 गीगावॉट बिजली पैदा होने की उम्मीद है।
  • डिस्ट्रिक्ट हीटिंग, स्पेस हीटिंग, औद्योगिक प्रक्रियाओं, विलवणीकरण और कृषि अनुप्रयोगों के लिए अतिरिक्त 28 गीगावाट की प्रत्यक्ष भूतापीय तापन क्षमता स्थापित की जाती है। इस अक्षय ऊर्जा स्रोत में छोटे और बड़े दोनों व्यवसायों को करने के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करने की क्षमता है।
  • भू-तापीय संसाधनों के जरिये कुल विश्व बिजली का 8.3% उत्पादन करना संभव है, जो विश्व की 17% आबादी को सेवा प्रदान करेगा।
  • बाजार अध्ययनों के अनुसार, भू-तापीय ऊर्जा में निवेश वैश्विक स्तर पर सालाना 24% बढ़ रहा है। यह असाधारण निवेश वृद्धि दर जारी रहने की उम्मीद है – और भविष्य में जो और भी तेजी से बढ़ सकती है।
  • दुनिया में भू-तापीय ऊर्जा संयंत्रों का सबसे बड़ा समूह कैलिफोर्निया के भू-तापीय क्षेत्र गीजर में स्थित है।
  • फिलीपींस इस ऊर्जा का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है, जिसकी ऑनलाइन क्षमता 1904 मेगावाट है। भूतापीय ऊर्जा देश की बिजली उत्पादन का लगभग 18% निर्मित करती है। इसके अलावा इंडोनेशिया में कुल बिजली उत्पादन का 5% भूतापीय ऊर्जा से आता है।
  • भूतापीय विद्युत संयंत्रों को पारंपरिक रूप से टेक्टोनिक प्लेटों के किनारों पर बनाया गया था जहां सतह के पास, उच्च तापमान भूतापीय संसाधन उपलब्ध हैं। बाइनरी साइकिल ऊर्जा संयंत्र का विकास और ड्रिलिंग व निष्कर्षण तकनीक में सुधार, अधिक से अधिक भौगोलिक सीमा पर बढ़े हुए भू-तापीय प्रणाली को सक्षम बनाता है।

भारतीय परिदृश्य:

  • Iभारत में भू-तापीय क्षमता के लिए काफी अच्छी संभावनाएं हैं; संभावित भूतापीय प्रांत 10,600 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर सकते हैं।
  • हालांकि भारत 1970 के दशक में भू-तापीय परियोजनाओं को शुरू करने वाले शुरुआती देशों में से एक रहा है, लेकिन वर्तमान में भारत में कोई परिचालनाधीन भू-तापीय संयंत्र नहीं हैं। अब तक कोई स्थापित भू-तापीय विद्युत उत्पादन क्षमता भी नहीं है और केवल प्रत्यक्ष उपयोग (उदाहरण के लिए ड्राइंग) को ही विस्तृत किया गया है।
  • पुणे स्थित एक कैपिटल गुड्स निर्माता थर्मैक्स ने आइसलैंडिक फर्म रेक्जाविक जियोथरमल के साथ एक समझौता किया है। थर्मैक्स लद्दाख (जम्मू और कश्मीर) की पुगा घाटी में 3 मेगावाट की पायलट परियोजना स्थापित करने की योजना बना रहा है। रेक्जाविक जियोथर्मल, साइट की खोज और ड्रिलिंग में थर्मैक्स की सहायता करेगा।
  • भारत का गुजरात राज्य भूतापीय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए एक नीति तैयार कर रहा है।
  • हिमाचल प्रदेश के मणिकरण में 5 किलोवाट क्षमता का एक प्रायोगिक भूतापीय विद्युत संयंत्र स्थापित किया गया है। उस क्षेत्र में उगाई जाने वाली सब्जियों और फलों के संरक्षण के लिए 900C पर भूतापीय ऊर्जा का उपयोग करने के लिए एक कोल्ड स्टोरेज प्लांट का भी निर्माण किया गया है।
  • कुछ प्रमुख स्थान जहां भूतापीय ऊर्जा के आधार पर एक बिजली संयंत्र स्थापित किया जा सकता है, वे हैं जम्मू-कश्मीर में पुगा घाटी और चुमाथांग, हिमाचल प्रदेश में मणिकरण, महाराष्ट्र में जलगाँव, उत्तराखंड में तपोवन, डब्ल्यूबी में बकरेश्वर, गुजरात में तुवा और छत्तीसगढ़ में तत्तपानी। MNRE भारत के भू-तापीय ऊर्जा संसाधनों की खोज और दोहन पर जोर दे रहा है।

भूतापीय ऊर्जा के लाभ:

  • कोई प्रदूषण नहीं: पावर स्टेशन को ऊर्जा प्रदान करने के लिए भूतापिक ऊष्मा के उपयोग का पहला लाभ यह है कि अधिकांश पावर स्टेशनों के विपरीत, एक भू-तापीय प्रणाली कोई प्रदूषण उत्पन्न नहीं करती है। यह थोड़े समय के लिए पृथ्वी के अंदर से कुछ गैसों को छोड़ती है, जो थोड़ा हानिकारक हो सकता है, लेकिन इन्हें काफी आसानी से समाहित किया जा सकता है। भूतापीय विद्युत संयंत्रों में सल्फर-उत्सर्जन की वह दर होती है जो जीवाश्म-ईंधन विकल्पों की तुलना में उनके कुछ प्रतिशत का औसत होती है।
  • कम खर्चीली भूमि का उपयोग: किसी तेल, गैस, कोयला या परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने की तुलना में भूगर्भीय विद्युत संयंत्र बनाने के लिए भूमि की लागत आमतौर पर कम खर्चीली होती है। इसका मुख्य कारण भूमि का स्थान है, क्योंकि भूतापीय संयंत्रों बहुत कम स्थान में बन जाते हैं, इसलिए भूमि का एक बड़ा क्षेत्र खरीदने की आवश्यकता नहीं है।
  • कोई पर्यावरणीय बिल या कोटा नहीं: इसका एक और पहलू यह है कि भूतापीय ऊर्जा बहुत साफ होने के कारण, देश में चल रही कार्बन उत्सर्जन योजना (यदि कोई लागू की गई है) का अनुपालन करने के लिए टैक्स में कटौती का लाभ प्रदान कर सकती है। संभव है कि किसी भी पर्यावरण बिल या कोटे का भुगतान शायद ही करना पड़े।
  • इसे उत्पन्न करने के लिए किसी भी ईंधन का उपयोग नहीं किया जाता है: बिजली (जिसका अर्थ है संयंत्रों के लिए परिचालन लागत) बहुत कम होती है क्योंकि बिजली पैदा करने के लिए इसमें ईंधन की खरीद, परिवहन या सफाई पर कोई खर्च आवश्यक नहीं होता।
  • कोई वित्तीय ओवरबर्डन नहीं: इन संयंत्रों का समग्र वित्तीय पहलू विशिष्ट है, इनमें केवल पानी पंपों को बिजली प्रदान करने की आवश्यकता होती है, जो कि बिजली संयंत्र द्वारा ही उत्पन्न की जा सकती है। क्योंकि वे मॉड्यूलर हैं, इसलिए किसी भी साइट पर इन्हें आसानी से ले जाया जा सकता है। बेसलाइन और पीकिंग पॉवर दोनों उत्पन्न की जा सकती है।
  • निर्माण समय – 5 से 10 मेगावाट की क्षमता वाले संयंत्रों का निर्माण महज 6 महीने में हो सकता है और 250 मेगावाट या उससे अधिक ऊर्जा वाले संयंत्रों के निर्माण में मात्र 2 साल का समय लग सकता है।

भूतापीय ऊर्जा के नुकसान:

  • एसिड और वाष्पशील रसायनों का उच्च स्तर: गहरी पृथ्वी से खींचे गए तरल पदार्थ गैसों, विशेष रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (CO2), हाइड्रोजन सल्फाइड (H2S), मीथेन (CH 4) और अमोनिया (NH 3) के मिश्रण को साथ लाते हैं। यदि ये प्रदूषक उत्सर्जित होते हैं तो ग्लोबल वार्मिंग, एसिड रेन, और विषाक्त गंधों में योगदान कर सकते हैं। एसिड और वाष्पशील रसायनों के उच्च स्तर का अनुभव करने वाले संयंत्र, आमतौर पर निकास को कम करने के लिए उत्सर्जन-नियंत्रण प्रणालियों से लैस होते हैं।
  • पर्यावरणीय क्षति: विघटित गैसों के अलावा, भूतापीय स्रोतों से निकलने वाले गर्म पानी में विषैले रसायनों जैसे पारा, आर्सेनिक, बोरोन और एंटीमनी की मात्रा हो सकती है। ये रसायन पानी के ठंडा होने के साथ ही बाहर निकलते हैं, और अगर निकलते हैं तो पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
  • भूमि की स्थिरता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करता है: संयंक्ष का निर्माण भूमि की स्थिरता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। न्यूज़ीलैण्ड के वैराकेई क्षेत्र में और जर्मनी के स्टैफेन इम ब्रेसगो में अवतलन हुआ था। बढ़ी हुई भूतापीय प्रणाली हाइड्रोलिक फ्रैक्चरिंग के हिस्से के रूप में भूकंप को उत्पन्न कर सकती है। बेसल, स्विट्जरलैंड में भी परियोजना को इसलिए निलंबित कर दिया गया था क्योंकि रिक्टर पैमाने पर 3.4 तक मापने वाली 10,000 से अधिक भूकंपीय घटनाएं पानी के इंजेक्ट करने के पहले 6 दिनों में ही हुई थीं।

भू-तापीय ऊर्जा संसाधनों को विकसित करने के अवसर क्या हैं?

  • गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों में शामिल स्वतंत्र विद्युत परियोजनाएं भू-तापीय ऊर्जा संसाधनों में गहरी रुचि दिखा रही हैं। यह इस क्षेत्र में काम करने वाले संगठनों जैसे IIT (चंद्रशेखरम, 1995) और GSI द्वारा लायी गयी जागरूकता के परिणामस्वरूप है।
  • एक बार के निवेश और कम रखरखाव लागत, कम क्षेत्र की आवश्यकता, और गैर-पारंपरिक ऊर्जा क्षेत्र के लिए सरकार द्वारा दिए गए प्रोत्साहन भारत में कई IPP को आकर्षित कर रहे हैं।
  • यहां तक कि IPP जो सौर फोटोवोल्टाइक और सौर थर्मल पावर व्यवसाय में शामिल हैं, वे भू-तापीय परियोजनाओं के लिए वित्तीय रूप से भागीदारों की खोज कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, मेसर्स एविन एनर्जी सिस्टम्स, जो सौर फोटोवोल्टाइक और सौर तापीय बिजली परियोजनाओं में शामिल हैं, गुजरात में भूतापीय परियोजनाओं को विकसित करने और अन्य राज्यों में भी अपनी गतिविधियों का विस्तार करने के इच्छुक हैं।
  • चूंकि सभी थर्मल प्रांत उत्कृष्ट संचार प्रणाली के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, इसलिए बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ भू-तापीय आधारित उद्योग शहरी क्षेत्रों में भीड़ को कम करने और ग्रामीण जनता की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करने जा रहे हैं।

निष्कर्ष:

कोयला आधारित परियोजना के कारण पर्यावरणीय समस्याओं में वृद्धि के साथ; जल विद्युत परियोजनाओं में IPP की गैर-भागीदारी; भविष्य में अन्य गैर-पारंपरिक ऊर्जा परियोजनाओं को विकसित करने में लॉजिस्टिक और तकनीकी समस्याओं के कारण भारत को स्वच्छ, ग्रामीण आधारित, सस्ती ऊर्जा स्रोतों पर निर्भर रहना होगा। इसके अलावा भारत अपनी 10,600 मेगावाट की भूतापीय क्षमता की भी अनदेखी नहीं कर सकता है। उपलब्ध उन्नत तकनीक के साथ, बाइनरी पॉवर प्रोजेक्ट्स का समर्थन करने के लिए सभी मध्यम तापीय धारिता संसाधन विकसित किए जा सकते हैं। वैकल्पिक रूप से, विदेशी IPP भी “बिल्ड-ओन-ऑपरेट-मेंटेन” (BOOM) योजना के तहत बिजली परियोजनाओं में भाग ले सकते हैं। कम से कम एक भू-तापीय ऊर्जा परियोजना के चालू होने से भारत के पूरे भविष्य के बिजली परिदृश्य में बदलाव होगा। वर्तमान में जिस चीज की जरूरत है, वह है रिजरवॉयर (Reservoir) मॉडलिंग पर अध्ययन शुरू करने की परियोजना। थर्मल गैसों पर विस्तृत डेटा का अभी भी अभाव है।

मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न:

भू-तापीय ऊर्जा परियोजनाओं की ओर उन्मुख बिजली परियोजनाओं का कारण क्या है, इसके लाभ और हानि क्या हैं? (200 शब्द)